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आज शराब कोई नशा नहीं, बल्कि एक स्वीकृत जीवनशैली बन चुकी है। तनाव का इलाज, असफलता का बहाना और क्रूरता का लाइसेंस — सब कुछ एक ही गिलास में घुला हुआ है। तनख़्वाह आती है तो सबसे पहले बोतल मुस्कुराती है, बच्चों की ज़रूरतें लाइन में खड़ी रह जाती हैं। माँ की आँखों से गिरते आँसू “ड्रामा” कहलाते हैं और पत्नी की ख़ामोशी “समझौता”। समाज जानता है कि शराब सब कुछ जला रही है, फिर भी कहता है — चलता है, आजकल तो यही फैशन है।
अगर यही सिलसिला चला, तो आने वाला कल और भी बेहिसाब होगा। शायद शराब पर चेतावनी नहीं, ब्रांडिंग होगी — कम पियो, लेकिन रोज़ पियो। रिश्तों की जगह बार काउंटर मज़बूत होंगे और बच्चों की यादों में पिता की शक्ल नहीं, नशे की गंध बसी होगी। भविष्य में इंसान कम और आदतें ज़्यादा ज़िंदा रहेंगी, क्योंकि आदतें मरती नहीं, बस पीढ़ी बदलती हैं।
सरकारें रोक क्यों नहीं लगा पातीं
क्योंकि शराब केवल नशा नहीं, एक स्थायी आय-स्रोत है। हर टूटता घर, हर बिखरता परिवार और हर लाचार इंसान
सरकार के खाते में टैक्स बनकर दर्ज होता है। नशे में डूबा नागरिक सवाल नहीं करता, सिस्टम से लड़ता नहीं। इसलिए शराब को बुरा कहा जाता है, लेकिन बेचना कभी बंद नहीं किया जाता। नीति में नैतिकता नहीं, केवल गणित चलता है
और उस गणित में इंसान हमेशा नुकसान में रहता है।
सच जो कड़वा है
शराब ने कभी किसी का भविष्य नहीं संवारा, लेकिन कई सरकारों के बजट ज़रूर संवार दिए। जब तक बोतल से ज़्यादा आवाज़ नोटों की आती रहेगी, तब तक नशा सिर्फ़ भाषणों में बुरा होगा, हकीकत में नहीं।
यह लड़ाई शराब से कम और उस व्यवस्था से ज़्यादा है, जो इंसानी कमजोरी को मुनाफ़े में बदल देती है
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